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12 फरवरी सन् 1931 ई. को वाटिकन रेडियो की स्पाथना के विषय में बात करना बड़ा सरल प्रतीत होता है तथापि उस महत्वपूर्ण क्षण के उत्साह और उमंग भरे विचित्र वातावरण को शब्दों में पिरोना वास्तव में टेढ़ी खीर है। विश्व समाचारों में कई वर्षों से विख्यात हो चुके महान वैज्ञानिक गुलियेलमो मारकोनी, कुछ डरे हुए से, 12 फरवरी सन् 1931 की ओर बढ़े; सच तो यह है कि काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष द्वारा उन्हें सौंपी गई यह विलक्षण योजना इतनी विराट थी कि उसके विचार से ही वे घबरा उठे थे। सन्त पापा पियुस 11 वें के आगमन पर, मारकोनी ने विनम्रतापूर्वक, घुटनों के बल गिरकर, सन्त पेत्रुस के उत्तराधिकारी को प्रणाम किया तथा उनकी अँगूठी चूमी। पितृसुलभ भाव से सन्त पापा ने सिर हिलाया, मुस्कुराये और अपने हाथ मारकोनी के कन्धों पर कुछ इस प्रकार रखा मानो उनका आलिंगन कर रहे हों। वाटिकन रेडियो की स्थापना का विवरण हम इन शब्दों में कर सकते हैं तथापि अस्सी वर्ष पूर्व वाटिकन की पहाड़ी पर उस क्षण मौजूद लोगों द्वारा कहे शब्दों से इसका वर्णन करना कहीं अधिक बेहतर होगा। 12 फरवरी सन् 1931 ई. को मारकोनी ने इन ऐतिहासिक शब्दों का उच्चार किया थाः "बड़े गौरव के साथ मैं यह घोषित करता हूँ कि कुछ ही क्षणों में काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष वाटिकन शहर और राज्य के रेडियो स्टेशन का उदघाटन करेंगे। रेडियो की विद्युत तरंगें, उनके शांति सन्देश तथा आशीर्वाद को सम्पूर्ण विश्व तक ले जायेंगी।"
इन्हीं शब्दों से विश्व विख्यात वैज्ञानिक गुलिेएलमो मारकोनी ने वाटिकन रेडियो के जन्म की उदघोषणा की थी। उन्होंने आगे कहा थाः "मानवजाति को प्रकृति की अनगिनत रहस्यमय शक्तियों के उपयोग की अनुमति देनेवाले सर्वशक्तिमान् ईश्वर की सहायता से मैं यह अस्त्र तैयार करने में समर्थ बना हूँ जो सम्पूर्ण विश्व को सन्त पापा की आवाज़ सुनने का आश्वासन देगा।"
फिर सन्त पापा पियुस 11 वें को सम्बोधित कर श्री मारकोनी ने कहा थाः "आदरणीय सन्त पापा, आपने जिस कार्य के लिये मुझे योग्य समझा, उसे आज मैं पुनः आपको अर्पित करता हूँ......मेरी मंगलकामना है कि आपकी कृपा से सम्पूर्ण विश्व आपके प्रतापी शब्दों को सुन सके। "
पहले प्रसारण के अवसर पर एक संवाददाता ने लिखा, "इस क्षण, सम्पूर्ण विश्व आतुरता से प्रतीक्षा कर रहा है ........ ख्रीस्त के प्रतिनिधि, इस नये अनिर्वचनीय अस्त्र के माध्यम से, एक स्पष्ट सुनाई देनेवाली आवाज़ में, बोलना शुरु करते हैं। अभी, ठीक चार बजकर उन्चास मिनट हुए हैं, दिन है 12 फरवरी सन् 1931।"
प्रथम रेडियो सन्देश का मूलपाठ स्वयं सन्त पापा पियुस 11 वें द्वारा, लैटिन भाषा में, लिखा गया था। सुसमाचारी सन्देश की सार्वभौमिकता पर बल देनेवाले अपने इस सन्देश को सन्त पापा ने पवित्र धर्मग्रन्थों से अनुप्राणित रखा था। इसकी प्रथम पंक्ति इस प्रकार थी, "सुनो, ओ स्वर्गो, जो कुछ मैं कह रहा हूँ; सुनो, हे धरती, उन शब्दों को सुनो जो मेरे मुख से निकलते हैं............सुनो, कान लगाकर सुनो, दूरस्थ प्रदेशों में बसे लोग, सुनो।" इस तरह प्राचीन व्यवस्थान के नबी की आवाज़ में दुहराते हुए वे शहर एवं सम्पूर्ण विश्व को सम्बोधित करते रहे।
अब हम, उस घटना की रिपोर्टिंग और उससे पहले के इतिहास पर एक दृष्टि डालें:
पियुस 11 वें का जन्म, सन् 1857 ई. में, इटली के मिलान शहर के निकटवर्ती देसियो में, हुआ था। जन्म के अवसर पर उन्हें अखिल्ले रात्ती नाम दिया गया था। छः फरवरी सन् 1922 ई. को आप काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष यानि सन्त पापा नियुक्त किये गये थे। उनके परमाध्यक्षीय काल का विषय थाः "ख्रीस्त के राज्य में ख्रीस्त की शांति"। सन्त पापा पियुस 11 वें की प्रबल इच्छा थी कि दूरस्थ मिशन क्षेत्रों में सुसमाचार का प्रचार किया जाये। वैज्ञानिक अनुसन्सान्धान के क्षेत्र में भी उन्होंने महान उदारता एवं उत्साह दिखाया था। उनका सुसमाचारी आदर्श वाक्य थाः "जो मैं कहता हूँ उसे छत के ऊपर जाकर चिल्लाओ ----- और जो कुछ तुम अंधियारे में सुनते हो उसे सूर्य के प्रकाश में आकर बोलो।" रेडियो के अन्वेषण से, अन्ततः, सुसमाचार के इस अंश को मूर्त रूप मिला। संकल्पना, योजनाएँ तथा एक रेडियो प्रसारण स्टेशन का काम जो सन्त पापा की आवाज़ को विश्वव्यापी श्रोताओं तक ले जाये अनेक वर्षों के अनुसन्धान और नियोजन कार्य का परिणाम है।
वाटिकन शहर में एक वायरलैस स्टेशन हेतु प्राथमिक योजनाएँ
सन् 1925 ई. में ही वाटिकन शहर में सम्प्रेषण माध्यम के महानिदेशक येसु धर्मसमाजी पुरोहित फादर जोसफ जानफ्रान्चेस्की वाटिकन के अन्तर एक वायरलैस स्टेशन की योजना बना रहे थे। 25 जुलाई सन् 1925 ई. को फादर जानफ्रान्चेस्की द्वारा लिखे एक पत्र में इस प्रकार के ट्रान्समिशन स्टेशन की स्थापना की बात कही गई है।
इसके दो साल बाद फादर जानफ्रान्चेस्की ने, सन्त पापा के लिये बनाई गई इस योजना को अनजाम देने हेतु वैज्ञानिक गुलियेलमो मारकोनी से सम्पर्क किया। मारकोनी ने इस उद्यम के प्रति अत्यधिक रुचि दर्शाई तथा सन्त पापा के लिये अपनी पूर्ण उपलभ्यता अर्पित की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी कह दिया कि कलीसिया के लिये वे यह काम निःशुल्क करेंगे। योजना पर काम शुरु होने से पहले दो और वर्ष बीत गये। वस्तुतः, सन् 1929 ई. में लातेरान समझौते पर हस्ताक्षर के बाद वाटिकन के उद्यान में ट्रान्समिशन केन्द्र का निर्माण कार्य शुरु हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर के मात्र चार दिन बाद मारकोनी को वाटिकन शहर-राज्य में इस योजना के निर्माण कार्य को आरम्भ करने की आधिकारिक अनुमति मिली।
काम तुरन्त शुरु हो गया। सन्त पापा के तत्कालीन वैयक्तिक सचिव कार्डिनल कोनफालोनियेरी ने वाटिकन में ट्रान्समिशन केन्द्र की स्थापना का विवरण इन शब्दों में कियाः "एक महान अन्वेषक मुझे प्रथम निरीक्षण के लिये वाटिकन के उद्यान ले गया। मारकोनी की सादगी प्रभावात्मक होने के साथ साथ आदर्शात्मक भी थी। यह सच है कि प्रतिभासम्पन्न को प्रदर्शन की ज़रूरत नहीं होतीः छोटे व्यक्ति ही अपनी ओर ध्यान आकर्षित कराते और अकड़ दिखाते हैं ...................ट्रान्समिशन केन्द्र के संस्थापन की प्रक्रिया द्रुत एवं प्रभावशाली ढंग से सम्पन्न हो गई।
निर्माण के दौर में, सन्त पापा पियुस 11वें, व्यक्तिगत रूप से, हर कदम और हर काम में मारकोनी के साथ रहे। 21 सितम्बर सन् 1930 ई. की तिथि बड़ी सूझ बूझ के बाद चुनी गई थी। वैज्ञानिक, परमधर्मपीठीय विश्वविद्यालय ग्रेगोरियाना के प्राचार्य, विज्ञान सम्बन्धी परमधर्मपीठीय अकादमी के अध्यक्ष तथा सन् 1929 में नोर्थ पोल तक खोजयात्रा में उमबेरतो नोबिले के सहयात्री येसु धर्मसमाजी पुरोहित फादर जोसफ जान फ्रान्चेस्की को वाटिकन रेडियो के पहले महानिर्देशक होने का गौरव प्राप्त हुआ।
सन्त पापा द्वारा हस्ताक्षरित, पहले महानिदेशक की नियुक्ति का दस्तावेज़ इस तरह शुरू होता है:
"समर्पित बेटे, हमने सोचा है कि एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति का यह उपयुक्त समय है जिसपर हमारा पूरा भरोसा है तथा जिसके पास इस नाज़ुक और महत्वपूर्ण सेवा को आगे बढ़ाने हेतु पूरी योग्यता है। हमारी पसन्द आपके समक्ष प्रस्तुत की गई है, हे प्रिय पुत्र ... इसलिए, हमारे इस नामांकन पत्र के साथ ही, हम आपको वाटिकन सिटी के रेडियो स्टेशन के निदेशक मनोनीत करते हैं। हम पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि आपके निर्देशन में यह हमें वे लाभ दिलायेगा जिनके लिये हम इसके निर्माण हेतु प्रेरित हुए थे।"
वाटिकन रेडियो की स्थापना में अन्य उच्च कोटि के विशेषज्ञों ने भी योगदान दिया। बेल्जियम के इंजीनियर जे बैपटिस्ट मैथ्यू, अँग्रेज़ी मारकोनी वायरलेस कंपनी के इस्टेड और जैक्सन तथा इतालवी इंजीनियर सान्तामरिया और एस्पोज़ितो ने भी मार्कोनी की सहायता की। निर्धारित तिथि तक इस परियोजना को पूरा करने में फादर जानफ्रान्चेस्की की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। दो वर्ष से भी कम समय में उक्त दल ने वाटिकन रेडियो का काम पूरा होते देखा।
वाटिकन रेडियो का उदघाटनः
वाटिकन रेडियो के उदघाटन दिवस पर संयुक्त राज्य अमरीका के पैरामाऊन्ट न्यूज़ के अनेक रिपोर्टर एवं कैमरामैन उपस्थित थे। इस घटना के फिल्मांकन के लिये वे अपने साथ उच्च तकनीकी उपकरणों को साथ लाये थे। उस समय के कैमरे यद्यपि हाथ से चलाये जाते थे उन्होंने, सिनेमा के इतिहास में पहली बार, सीधे साऊन्ड ट्रैक के साथ किसी बाहरी घटना को फिल्मांकित किया था। वाटिकन रेडियो के संग्रहालय में आज भी इस घटना की फिल्म सुरक्षित है जो कलीसिया एवं टेलेकमयूनिकेशन के इतिहास में एक अद्वितीय घटना का प्रमाण है।
12 फरवरी सन् 1931 ई. को, दोपहर के साढ़े तीन बजे मारकोनी आये और उन्होंने एक बार फिर रेडियो के उपकरणों का परीक्षण किया। वे स्टूडियो में पधारे और इयरफोन को अपने सिर पर लगाकर पारमहाद्वीपीय ट्रान्समिशन शुरु किया। न्यू यॉर्क, मेलबर्न और क्वबैक से स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी। इस बीच, फादर फ्रान्चेस्की सन्त पापा के प्रसारण की अन्तिम तैयारी में लगे रहे। प्रश्नों का भरमार के बावजूद उन्होंने स्नेहवश मुस्कुराते हुए सभी को जवाब दिया और तनावों को कम किया। कुछ क्षणों के बाद, सन्त पापा के आगमन तक, सभी उपकरणों को बन्द कर दिया गया।
स्टेशन पर महामौन छा गया: शक्तिशाली मशीनें मौन रहकर प्रतीक्षारत थीं; नियंत्रण पट्टी पर लगे बल्बों को बुझा दिया गया; मानों, सम्पूर्ण विश्व अधीरतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहा था। कुछ ही क्षणों में उस स्विच को दबा दिया जायेगा जो पूरे विश्व को सिगनल प्रेषित करेगा। यह वह चमत्कारी क्षण होगा जो ईश्वर एवं उनकी कलीसिया को महिमान्वित करेगा।
घड़ी, दोपहर के चार बजकर 20 मिनट, बता रही थी। तुरही के नाद ने सन्त पापा के आगमन की घोषणा की। वे अपनी मोटरगाड़ी से आये और रेडियो ट्रान्समिशन स्टेशन की ओर चले। सभी ने घुटनों के बल गिरकर पेत्रुस के उत्तराधिकारी का स्वागत किया। इमारत के प्रवेश द्वार पर गुलिएलमो मारकोनी तथा फादर फ्रान्चेस्की पियुस 11 वें के स्वागत को तैयार खड़े थे। इसके बाद सन्त पापा को जनरेटर कक्ष तक ले जाया गया जहाँ स्थिरता के साथ उन्होंने क्रिया तंत्र को शुरु किया जिससे घर्र घर्र की आवाज़ से भारी कम्पन के साथ मशीनें चल पड़ीं। सन्त पापा ने वाटिकन रेडियो के पहले प्रसारण के लिये मशीनों को आरम्भ कर दिया था।
पहला सिगनल मॉर्स कोड में पहुँचाना था। तकनीशियन ने In Nomine Domini, Amen अर्थात् "ईश्वर के नाम पर आमेन", से काम शुरु किया। उसी क्षण, रेडियो स्टेशन, जहाज़ और सिगनल ग्रहण करने योग्य जितने भी संयत्र थे, सबने इस आशीर्वाद एवं आमंत्रण को सुना। मारकोनी द्वारा सन्त पापा के परिचय के बाद, सन्त पापा पियुस 11 वें ने माईक्रोफोन उठाया तथा कलीसिया के परमाध्यक्ष द्वारा सर्वप्रथम रेडियो सन्देश का उदघाटन किया।
21 फरवरी, सन् 1931 ई., समाचार पत्रों में:
लोस्सरवात्तोरे रोमानो: कल रोम में, बहुत से लोग रेडियो के इर्द गिर्द एकत्र हुए। जहाँ तहाँ, बिजली की दूकानों आदि के आस पास लोगों को रेडियो के निकट कान लगाते देखा गया। कई जगह पर ट्रैफिक जैम हो गया था..........
ट्यूरिन के गज़ेत्ता देल पोपोलोः रेडियो ट्रान्समिशन के रेडियो कैपिटल में आज, अपरान्ह साढ़े चार तथा साढ़े पाँच के बीच, एक अविस्मरणीय घटना हुई। अनेक धार्मिक संघों के सदस्य सन्त पापा के रेडियो सन्देश को सुनने के लिये आतुरता से प्रतीक्षा करते रहे थे।
न्यूज़ क्रोनिकल, लन्दनः पहली बार सन्त पापा की आवाज़ लन्दन में तथा विश्व के करोड़ों लोगों द्वारा सुनी गई....................3,500 काथलिक धर्मानुयायी सन्त पापा की आवाज़ सुनने वेस्टमिन्स्टर के महागिरजाघर में घणटों प्रतीक्षा करते रहे।
न्यू यॉर्क हेराल्डः विश्व के इतिहास में कुछ ही घटनाएँ ऐसी हैं जिनकी तुलना रोमी काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष द्वारा प्रसारित रेडियो सन्देश के गहन प्रभाव के साथ की जा सकती है..........और ऐसी घटना की कल्पना अन्य किसी भी पूर्व सन्त पापा द्वारा नहीं की गई थी। यह विज्ञान का चमत्कार है, और निःसन्देह विश्वास का चमत्कार है।
वाटिकन रेडियो आजः
सन् 1931 ई. में, वाटिकन रेडियो की स्थापना के साथ ही रेडियो स्टेशन के संचालन की ज़िम्मेदारी येसु धर्मसमाज को सौंप दी गई थी। इसके प्रथम महानिर्देशक थेः फादर जान फ्रान्चेस्की एस.जे. तथा वर्तमान निर्देशक हैं फादर फेदरीको लोमबारदी एस.जे.।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय वाटिकन रेडियो ही वह एकमात्र माध्यम था जिसके सहारे लोगों को युद्ध बंदियों के बारे में सूचनाएं मिला करती थी।
सन् 1970 में लगाये गये 1000 किलो वॉट के शक्तिशाली संयंत्र को सन् 1990 में बदल दिया गया और वाटिकन रेडियो ने सैटलाईट को माध्यम से अपना प्रसारण आरम्भ कर दिया, जिसका केन्द्र वाटिकन में ही स्थापित किया गया।
आज, टेलेविज़न, इन्टरनेट एवं सैटलाईट टैकनॉलोजी के वृहत जाल द्वारा सम्प्रेषण माध्यम के नवीन तरीके विकसित होकर सम्पूर्ण विश्व में फैल रहे हैं। वाटिकन रेडियो इस प्रगति के साथ कदम मिलाता आगे बढ़ रहा है। एक उत्कृष्ट सम्प्रेषक रूप में उसने अपना स्थान बनाये रखा है, विशेष रूप से, उन स्थलों पर जहाँ टैकनॉलोजी के दृश्यमान माध्यम उपलब्ध नहीं हैं। इन्टरनेट, वेब और यू-ट्यूब जैसी नवीन तकनीकियों में प्रवेश करने के बावजूद वाटिकन रेडियो ने विश्व के उन विशाल क्षेत्रों के प्रति अपनी आँखें नहीं मूँदी है जहाँ लोग नवीन तकनीकी माध्यमों से वंचित हैं तथा जो केवल एक साधारण रेडियो पर निर्भर रहते हैं।
आज वाटिकन रेडियो, प्रतिदिन, विश्व की 45 भाषाओं में, 66 घंटों का प्रसारण करता है। 38 भाषाएँ वेब पर भी उपलब्ध हैं। वाटिकन रेडियो में 59 राष्ट्रों के लगभग 355 पत्रकार, तकनीशियन एवं अन्य कार्यकर्त्ता अपना योगदान दे रहे हैं। सन् 1964 ई. में वाटिकन रेडियो के भारतीय विभाग की स्थापना हुई थी जो आज हिन्दी, तमिल, मलयालम, अँग्रेज़ी एवं उर्दु भाषाओं में दक्षिण एशिया के श्रोताओं के हितार्थ प्रसारण कर रहा है।
वाटिकन रेडियो का मुख्य उद्देश्य प्रभु येसु मसीह के प्रेम सन्देश को जन-जन में पहुँचाना है। इसी लिये उसके दैनिक प्रसारणों में काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु सन्त पापा के संदेशों तथा परमधर्मपीठ की गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके साथ ही, वाटिकन रेडियो, ख्रीस्तीय मूल्यों के आधार पर, विश्व की दैनिक घटनाओं की व्याख्या कर उनका प्रसारण करता है ताकि शांति और न्याय को बढ़ावा मिल सके। अपने प्रसारणों द्वारा वाटिकन रेडियो आरम्भ ही से पारिवारिक जीवन की महत्ता, मौलिक अधिकारों की रक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, अन्तर-कलीसियाई और अन्तर-धार्मिक एकता का समर्थक, प्रचारक एवं उदघोषक रहा है। आतंकवाद, अलगाववाद, युद्ध, प्राणदण्ड एवं सभी प्रकार के अन्याय का भी वाटिकन रेडियो खुलकर विरोध करता रहा है। वाटिकन रेडियो की एक विशेषता यह भी रही है कि उसने ख़ुद को सिर्फ धार्मिक बातों से जोड़े नहीं रखा अपितु, दलगत राजनीति से दूर रहकर, सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक मसलों पर भी, विवेकपूर्ण सुझावों द्वारा विश्व को मार्गदर्शन दिया है।
सचमुच, सन्त पापा का रेडियो सम्पूर्ण विश्व के लिये आदर्श ख्रीस्तीय जीवन की एक झलक प्रस्तुत करता है। वाटिकन रेडियो को सुनने के लिये आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
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